कैरी बैग के पैसे वसूलना कानूनी या गैरकानूनी ? जाने ehindigyan

कैरी बैग के पैसे वसूलना कानूनी या गैरकानूनी ? जाने

कैरी बैग के पैसे वसूलना कानूनी या गैरकानूनी ? जाने
इस ब्‍लॉग में आपके काम की बात में करने जा रहा हूँ। प्रश्न यह है कि आप कभी किसी मॉल में शॉपिंग करने जाते हैं हजारों रुपये की शॉपिंग करते हैं और शॉपिंग करने के बाद जब आप काउंटर पर पहुंचते हैं और बिलिंग करने के बाद कैश काउंटर पर सेल्‍समेन आपसे पूछते है की आपको कैरीबैग भी चाहिए। अगर आप कहते हैं कि मुझे कैरीबैग चाहिए तो उस कैरीबैग का अलग से शुल्क अमाउंट वसूला जाता है। अब जब आप कैर्री बैग खरीदते हैं और उसमें उस कंपनी की ब्रांडिंग लोगो या मोनो लगा हुआ है तो आप उसको खरीद कर लेकर जाएंगे तो आपको पैसे देने क्यों देने चाहिए? दूसरी बात यह है कि अगर कैरीबैग का चार्ज करना कानूनी है तो फिर जो मध्यम वर्ग के बिज़नेस मैन है या ठेलेवाले हैं जिनसे आप सब्जी लेते हैं तो वो कैर्री बैग फ्री में देते हैं।
हाल ही में कंज़्यूमर कोर्ट ने Domino’s पर 10 लाख का जुर्माना लगाया है। बीच में खबर आई थी आपने पढ़ा होगा कि BATA पर जुर्माना लगाया गया है। Big Bazaar पर भी कार्रवाई हुई है। आज इसके कानूनी पहलुओं पर चर्चा करेंगे कि क्या कैरीबैग का पैसा लिया जा सकता है। लिया जा सकता है तो कितना। कौन से कैरीबैग चार्जेबल होंगे, कौन से नहीं होंगे। अभी हाल ही में उपभोक्ता फोरम ने भावना गुप्ता चेतन गोयल और तनु मलिक की शिकायत पर Big Bazaar के ऊपर 15,000 का जुर्माना लगाया इसके साथ ही 100-100 रूपये के मुआवज़े के साथ 11,000 केस खर्च के रूप में देने को भी कहा। मामला यह था कि Big Bazaar में ₹18 में कैरीबैग दिया था। पहले भी Consumer Forum ने Domino’s पर भी 10 लाख तक का जुर्माना लगाया था।

क्या कोई दुकान, मॉल या  शॉप कीपर किसी व्यक्ति से कैरीबैग के लिए पैसे ले सकते हैं

केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के मौजूदा सरकारी आदेशों के अनुसार रिटेल जो सेलर है, खुदरा विक्रेता जो है कंपनी के लोगों का उपयोग किए बिना प्लास्टिक कैरीबैग या जो कागज का कैरीबैग है या कपड़े का कैरीबैग जो दे रहे है उसके लिए शुल्क ले सकते हैं। लेकिन यदि कैरीबैग में उनका कोई लोगो या मोनो लगा हुआ है तो आपको मुफ्त में मिलेगा। फिर एक प्रश्न आपके मन में आ सकता है कि छोटे दुकानदार कैरीबैग के लिए चार्ज क्यों नहीं लेते बड़े दुकानदार ही क्यों चार्ज ले रहे हैं। तो वास्तव में BATA, Reliance Treand, DMart, Big Bazaar जैसे अन्‍य कुछ जो रिटेलर्स है ये ऑर्गनाइज्ड रिटेल के अंतर्गत आते हैं ये सभी पर्यावरण और वन मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं। जिसके चलते प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट ऐंड हैंडलिंग रूल्स 2011 को फॉलो करना उनकी जिम्मेदारी है। पर्यावरण और वन मंत्रालय भारत सरकार के आदेश के अनुसार 4 फरवरी 2011 के बाद से ग्राहक से छोटे पेपर बैग के लिए ₹3 मीडियम पेपर बैग के लिए ₹5 और बड़े आकार के पेपर बैग के लिए अधिकतम ₹7 का शुल्क लिया जा सकता है इन कैरीबैग को चार्जेस या चार्जेबल बनाने का जो मकसद है वो यह कि कागज और पॉली बैग के उपयोग को कम कर दिया जाए और लोग अपने साथ कैर्री बैग लेकर चलने की आदत डालें। इसलिए कंपनियां कैरीबैग के चार्जेस लेती है।
अब प्रश्न यह उठता है कि जो बड़े रिटेलर्स है ये क्यों कैरीबैग के चार्ज ले रहे हैं और छोटे और मध्यम व्यापारी के खिलाफ़ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है इसका बड़ा कारण है कि छोटे और मध्यम व्यापारी ज्यादातर लिस्टेड ही नहीं होते पोलीथिन पर प्रतिबंध के कारण सब्जी और फल विक्रेता या डीलर जो है वो छोटे व्यापारी ग्राहकों को प्लास्टिक की थैलियों में उत्पाद पहुंचाते रहते हैं। क्योंकि Administration इनको सकती में ढील दे रहा है और इन पर कार्यवाही नहीं हो रही है इसलिए ऐसा कर पा रहे हैं और बहुत से लोग चलते चलते रास्ते में ठेले से रेडी से सामान खरीदते हैं और अपने साथ कैर्री बैग लेकर जाना जरूरी नहीं समझते। दुकानदार अपने कस्टमर्स बनाने के लिए फ्री कैरीबैग देते रहते हैं।
इस ब्‍लॉग से आपको दो-तीन बातें समझ में आ गई होंगी –
  1. बड़े रिटेलर्स बैग के लिए चार्ज कर सकते हैं छोटे रिटेलर्स को भी चार्ज करना चाहिए उन्हें छूट नहीं है लेकिन मैंने बताया क्योंकि वो लिस्टेड नहीं है और गवर्नमेंट और Administration की नजर उनपर नहीं है। इसलिए वो आपको कैर्री बैग फ्री में दे रहे हैं। जबकि कैरीबैग के लिए चार्ज लेना जरूरी है जैसा कि मैंने आपको जानकारी दी।
  2. लेकिन एक बहुत इम्पोर्टेन्ट बात यह है कि जब कभी कोई कैरीबैग चार्जेबल होगा तो वो चार्जेबल कैरीबैग किसी तरह का प्रिंट उसमें नहीं होना चाहिए उसमें कंपनी के लोगो मोनो नहीं होने चाहिए कंपनी की ब्रांडिंग नहीं होनी चाहिए इसका दूसरा मतलब यह है कि बड़े रिटेलर्स दी प्यारी बैग फ्री में दे सकते हैं उसमें अपनी ब्रैंडिंग और Logo & Mono को लगा करके।
 
 

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